ताऊ से सहमति-असहमति तो चलती रहती है,
बातों की नोक-झोंक में ज़िंदगी गुज़रती रहती है।
पर आज ताऊ को देखा—
पर्स को जींस की अगली जेब में सहेजते हुए,
जैसे कोई खज़ाना छुपाते हों चुपके से।
उस एक पल में,
सारी बहसें धुंधली पड़ गईं,
सारे मतभेद मौन हो गए।
बस एक तार जुड़ा—
वो अपनापन,
जो शब्दों में नहीं, आदतों में बसता है,
जो रिश्तों की जड़ों में चुपचाप पलता है।
ताऊ की वो छोटी सी आदत,
मुझे याद दिला गई—
कि हम कितने भी अलग हों,
अपनापन खून से नहीं, आदतों से जन्मता है,
छोटी-छोटी आदतों में ही तो पूरा कुनबा बसता है।