तीन ताल के इस निज़ाम को आदाब अर्ज़ है।
एक छोटी सी नज़्म लिखी है कुछ ग़लती हो तो माज़ेरत 🙏🏻
इक रोज़ मेरी फीड में आया था तू नज़र,
जाने क्यूं हाथ रुक गए तुझ तीन ताल पर,
कुछ देर तक तो था ये मेरी सोच से इतर,
फेरी इधर नज़र तो कभी उस तरफ नज़र,
दिन थे बड़े वो रंज के तू कू बकू सहर,
हम जैसे तन्हा लोग को मिल जाए जैसे घर,
जो सुन लूं तो लगे कि हाँ ये अपनी है ख़बर,
हंसना कभी संगीन कभी इल्म बार दर,
इन तीन तालियों का मैं चौथा सा रह गुज़र,
खुश हूं कि मेरी फीड में आते रहे हो तुम,
ताऊ को खान चा को सुनाते रहे हो तुम,
इस सुर्ख़ ज़िंदगी को सजाते रहे हो तुम,
अक्सर मेरे मिज़ाज में आते रहे हो तुम,
फ़िलहाल को ये नज़्म यहीं पर रकम किया,
कुलदीप भाई की ज़बान पर रहम किया,
कुछ तमने इस गुमान को मेरे वहम किया।
– सय्यद वली अब्बास
जौनपुर से