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आदिमानव

@Adimanab

00, Nepal

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आम आदमी की ज़िंदगी भी आम जैसी है पकने तक संघर्ष करता है फिर एक दिन टपक जाता है।
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Kosis करते रहिये क्योंकि Bhagwan भी उसी का साथ देते हैं.. जो Hindu होते हैं Musalman का साथ तो Allah देते हैं 😁😁 
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खुद को पसंद करना ही ज़िंदगी का "जश्न” है! कोई और पसंद न करे, तो यह उसका “प्रश्न” है।
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एक गोलगप्पे की दुकान का मेन्यू बहुत ही कमाल का था:  * नॉर्मल: ₹10  * स्पेशल: ₹15  * वेरी स्पेशल: ₹20  * एक्स्ट्रा स्पेशल: ₹25  * डबल एक्स्ट्रा स्पेशल: ₹30  * संडे स्पेशल: ₹50 मैंने रोज एक-एक प्लेट गोलगप्पे अलग-अलग प्रकार के खाने चालू किए। सारे गोलगप्पों का स्वाद एक ही जैसा था! तो हमने कहा, "हर दिन का स्वाद एक जैसा है, तो रेट अलग-अलग क्यों?" तो वह बोला, "सभी गोलगप्पों की कीमत ₹10 ही है।  * स्पेशल का मतलब—चम्मच धुला हुआ है।  * वेरी स्पेशल का मतलब—चम्मच और प्लेट दोनों धुले हुए हैं।  * एक्स्ट्रा स्पेशल का मतलब—गोलगप्पे देने से पहले हम हाथ धोते हैं और चम्मच-प्लेट दोनों धुले होते हैं।  * डबल एक्स्ट्रा स्पेशल का मतलब—मिनरल वाटर इस्तेमाल करते हैं।" तो मैंने पूछा, "संडे स्पेशल क्या है?" तो वह बोला, "संडे को मैं नहा कर आता हूँ।"
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शहर ने बहुत कुछ दिया... कमाने का तरीका दिया, अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया, लोगों की भीड़ दी, और शायद थोड़ी पहचान भी। लेकिन बदले में वो पुराना घर छीन लिया, वो बेफिक्र शामें छीन लीं, वो दोस्तों के साथ बिना वजह घूमना छीन लिया।  अब लौटना भी चाहें तो वो गलियां तो वहीं हैं, मगर उनमें हमारा बचपन नहीं है। शायद इसलिए बड़े होकर इंसान घर नहीं, अपना पुराना वक्त ढूंढता है।
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खरगोश ही जीता था उस दिन कछुए के साथ रेस में बस हमने कहानी का गलत वर्ज़न सुना है। हमें क्या बताया गया? खरगोश आलसी था अभिमानी था। गलत है! वो आलसी होता तो बीच रास्ते में सो जाता। अभिमानी होता तो शुरुआत में ही सो जाता। लेकिन उसने जीत की दहलीज़ पर पहुँचकर जीत को लात मार दी। क्योंकि वह विद्रोह करना चाहता था उन लोगों से, जिन्होंने हर दौड़ को हार और जीत में बदल दिया था। उसने कहा—“तुम्हारा यह फ्रेमवर्क कहता है न कि मेहनत करोगे तभी जीतोगे? तो मैं जीत से एक मिनट पहले सोऊँगा। इसलिए नहीं कि मैं जीत नहीं सकता बल्कि इसलिए कि मुझे समझ आ गया है—मेरी नींद तुम्हारी इस फालतू दौड़ के प्रपंच से ज़्यादा ज़रूरी है।” उस दिन खरगोश सोया नहीं था जाग गया था।
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जिन्हें उनसठ, उनहत्तर, उन्यासी, नवासी तुरंत समझ आ जाते हो उन्हें हिंदी दिवस की शुभकामनाएं बाकियों को "हैप्पी हिंदी डे" 😁 
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वास्तविक जीवन में सबसे कठिन निर्णय वही होता है- जब भावनाएँ सत्य को स्वीकार करने से रोकें और विवेक यह समझा दे कि हर प्रिय चीज़ जीवन में रहने योग्य नहीं होती.
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बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा था कि ज्यादातर लोग 25 साल की उम्र में मर जाते हैं और 75 साल की उम्र में दफना दिए जाते हैं। फ्रांज़ काफ्का ने भी लिखा था कि, "मुझे खुद नहीं पता कि मैं जिंदा हूँ या सिर्फ जिंदा रहने का दिखावा कर रहा हूँ।" जावेद अख्तर साहब का शेर है: "न फिक्र कोई न जुस्तजू है, न ख्वाब कोई न आरजू है, ये शख्स तो कब का मर चुका है, तो बे-कफ़न फिर ये लाश क्यों है?" जॉन एलिया के कलम को भी चुप अच्छी नहीं लगी, तो लिखते हैं कि: "वो दोपहर अपनी रुखसत की ऐसा वैसा धोखा थी, अपने अंदर अपनी लाश उठाये मैं झूठा ज़िंदा था।"
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Bhojpuri industry always work on current affairs..... 1980 वाला फोटो मे भी चोर लगतारे!😂 
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