शहर ने बहुत कुछ दिया... कमाने का तरीका दिया, अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया, लोगों की भीड़ दी, और शायद थोड़ी पहचान भी।
लेकिन बदले में वो पुराना घर छीन लिया, वो बेफिक्र शामें छीन लीं, वो दोस्तों के साथ बिना वजह घूमना छीन लिया।
अब लौटना भी चाहें तो वो गलियां तो वहीं हैं, मगर उनमें हमारा बचपन नहीं है।
शायद इसलिए बड़े होकर इंसान घर नहीं, अपना पुराना वक्त ढूंढता है।