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आदिमानव

@Adimanab

00, Nepal

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नासा के साइंटिस्टों को तो उसी टाइम हार्ट अटैक आ गया था जब उन्हें पता चला था कि जो  हमारे पंडित हैं वो 101 रुपये लेके ग्रहों की चाल बदल देते हैं।🤣 
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महात्मा गांधी के तीन बंदर थे—एक अंधा, एक बहरा और एक गूंगा। कहा जाता है कि गांधी जी तो चले गए, लेकिन उनके तीनों बंदर आज भी हमारे बीच मौजूद हैं। जो अंधा बंदर था, वह कानून बन गया, क्योंकि उसे सच्चाई दिखाई नहीं देती। जो बहरा बंदर था, वह सरकार बन गया, क्योंकि उसे जनता की आवाज़ सुनाई नहीं देती। और जो गूंगा बंदर था, वह मीडिया बन गया, क्योंकि अब उसके मुँह से सच नहीं निकलता।
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साल 1978 में एक फिल्म आई थी "मुकद्दर का सिकंदर".... जिसमें... अमजद खान रेखा को चाहता है। रेखा अमिताभ को चाहती है। अमिताभ राखी को चाहता है। राखी विनोद खन्ना से प्यार करती है। लेकिन दुश्मनी अमिताभ बच्चन और अमजद खान के बीच है। अब आते हैं पश्चिमी एशिया पर.... भारत इज़राइल के साथ है। इज़राइल अमेरिका के साथ है। अमेरिका पाकिस्तान के साथ है। पाकिस्तान ईरान के साथ है। लेकिन दुश्मनी भारत और पाकिस्तान के बीच है। इस पहेली को एक ही आदमी सुलझा सकता है, जिसका नाम है कादर खान। लेकिन वह 2018 में मर चुके है। तो चुपचाप जंग देखो।😄😄 
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भारतीय चिंतक विनोबा भावे का मानना था कि "स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि तुम जो चाहो वह कर सको, बल्कि यह है कि तुम्हें जो करना चाहिए उसे करने की शक्ति हो।" यदि कोई व्यक्ति अपने क्रोध, लालच, भय या बुरी आदतों पर नियंत्रण नहीं रख सकता, तो वह वास्तव में स्वतंत्र नहीं है। आज मोबाइल का एक नोटिफिकेशन भी हमारा ध्यान भटका देता है। ऐसे में प्रश्न उठता है—मालिक कौन है, हम या हमारी आदतें? विनोबा भावे कहते हैं कि मनुष्य को बाँधने वाली जंजीरें केवल लोहे की नहीं होतीं, बल्कि इच्छाओं, डर और लालच की भी होती हैं। जो व्यक्ति स्वयं पर शासन करना सीख लेता है, उसे किसी और पर शासन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। भारतीय चिंतन के अनुसार सच्ची स्वतंत्रता बाहर नहीं, बल्कि भीतर से शुरू होती है। आत्मसंयम, अनुशासन और विवेक ही वास्तविक आज़ादी का आधार हैं।
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इत्र, मित्र, चित्र और चरित्र किसी की पहचान के मोहताज नहीं होते। इत्र की खुशबू दूर तक अपना परिचय दे देती है, सच्चा मित्र मुश्किल समय में पहचान बता देता है, चित्र बिना शब्दों के कहानी कह देता है, और चरित्र उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह चारों अपने गुणों से जाने जाते हैं ना कि लोगों की तारीफों से।
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विज्ञान तुम्हारे कंकाल से यह पता कर सकता है कि तुम बूढ़े थे या जवान, गोरे थे या काले, नर थे या फिर मादा, लेकिन यह कभी पता नहीं कर सकते कि तुम शूद्र थे या ब्राह्मण, वैश्य थे या फिर क्षत्रिय या फिर हिंदू थे या फिर मुस्लिम। क्योंकि तुम यह कभी थे ही नहीं और यह सिर्फ तुम मानते हो, और मानने का कोई मूल्य नहीं होता बल्कि होने का होता है।
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आज बड़े दिनों बाद गिले हाथ पोच्छने के लिए रुमाल खरीदा तो पैंट का पिछवाड़ा बोल पड़ा, कौन सी गलती हो गई साहब हमसे जो सौतन उठा लाये !!
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चलो मान लिया कि गलती चंदर की थी... लेकिन क्या सुधा की कोई गलती नहीं थी? अगर प्रेम था, तो क्या उसे अपने मन की बात और स्पष्टता से नहीं कहनी चाहिए थी? क्या उसे चंदर के आदर्शों और चुप्पी को ही अंतिम सच मान लेना चाहिए था ? मुझे लगता है कि "गुनाहों का देवता" में सबसे बड़ा दोष किसी एक का नहीं, बल्कि उन बातों का था जो कभी कही ही नहीं गई। चता कई रिश्ते गलत फैसलों से नहीं, अधूरी बातों से टूटते हैं।
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आज बड़े दिनों बाद गिले हाथ पोच्छने के लिए रुमाल खरीदा तो पैंट का पिछवाड़ा बोल पड़ा, कौन सी गलती हो गई साहब हमसे जो सौतन उठा लाये !!
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स्त्री हमेशा सीता ही क्यों, वो बुद्ध क्यों नहीं बन सकती? क्योंकि बुद्ध की तरह अगर वो सोते हुए पति और बच्चों को छोड़कर निकल भी जाए, तो घटिया समाज पहले ही यह निश्चित कर चुका होगा कि पक्का प्रेमी के साथ भागी है, कोई यह नहीं सोचेगा कि वो खुद की तलाश में निकली है। ​यह समाज भी बहुत दोगला है, क्योंकि जब बुद्ध जंगल से लौटे तो उन्हें महान बना दिया और जब सीता जी लौटीं तो उन्हें कलंकित बना दिया गया।
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