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Mini Bhopali

@MADHURDUBEY

Vadodara, Gujarat, India

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पचपनवाँ वर्ष — पन्ना चेहरे पर हैं झुर्रियाँ लेकिन, मन अब भी जवान। बच्चों से ज़्यादा अब दोनों, रखते एक-दूजे का ध्यान। ⸻ साठवाँ वर्ष — हीरा हीरा बनना आसान कहाँ, कितनी चोटें खानी हैं। जो साथ रहे हर मौसम में, वही असली कहानी है। ⸻ समापन वर्षगाँठ के ये नाम सभी, यूँ ही नहीं बनाए। हर पड़ाव पर जीवन ने, कुछ नए अर्थ सिखाए। शादी केवल सात फेरे, या कुछ वचन निभाना नहीं। दो लोगों का धीरे-धीरे, “मैं” से “हम” बन जाना यही।
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तीसवाँ वर्ष — मोती एक सीप में दो मोती, साथ-साथ मुस्काते हैं। अब कम बोलें, ज़्यादा समझें, आँखों से बतियाते हैं। ⸻ चालीसवाँ वर्ष — माणिक अब अनुभव ही दौलत है, किस्सों की भरमार। कोई पूछे—“राज़ बताओ…” दोनों हँस दें बार-बार। ⸻ पैंतालीसवाँ वर्ष — नीलम अब न गुस्सा जल्दी आता, न हर बात सताती है। जीवन क्या है, यह समझ धीरे-धीरे आती है। ⸻ पचासवाँ वर्ष — स्वर्ण सोना यूँ ही सोना कब था? आग बहुत सहता है। वैसे ही हर रिश्ता अपना, समय-समय पर तपता है।
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विवाह वर्षगाँठ के रहस्य पहला वर्ष — कागज़ पहला वर्ष कागज़ जैसा, सपनों से भर जाता है। कभी प्रेम-पत्र लिखे जाते, कभी समझौता याद आता है। ⸻ पाँचवाँ वर्ष — लकड़ी पाँच बरस में पेड़ बने हम, जड़ें एक हो जाती हैं। एक गिरे तो दूसरा डोले, शाखें साथ निभाती हैं। ⸻ दसवाँ वर्ष — टिन दस बरस तक साथ रहे तो, ठन-ठन थोड़ी होती है। बाहर वाले कहते झगड़ा, घर में वही तो संगीत है। ⸻ पंद्रहवाँ वर्ष — क्रिस्टल क्रिस्टल जैसे साफ़ हुए हम, सच सब खुलकर दिखता है। अब बदलेंगे? छोड़ो यार… जो है, जैसा है, अच्छा है। ⸻ बीसवाँ वर्ष — चाइना बच्चे अब समझदार हुए, देने लगे सलाह। “मम्मी, पापा… सच बताना, कैसे निभी ये राह?” ⸻ पच्चीसवाँ वर्ष — चाँदी चाँदी रोज़ चमकती कब है? रगड़ो तब दमकती है। वैसे ही रिश्तों की चमक, रोज़ संभालने से रहती है। ⸻
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कल  हमारे एक प्रिय मित्र की विवाह वर्षगाँठ थी। उन्हें दूरभाष पर शुभकामनाएँ देने के बाद सायंकाल मैं और मेरी संगिनी टहलने निकले। चलते-चलते बात विवाह वर्षगाँठों पर आ पहुँची। चर्चा होने लगी कि आखिर प्रथम वर्ष को Paper, पाँचवें को Wood, पच्चीसवें को Silver और पचासवें को Golden Anniversary क्यों कहा जाता है? मैंने मुस्कुराकर पूछा, “इन नामों के पीछे कोई गहरा अर्थ होगा, या किसी विवाहित महापुरुष का अनुभव?” बस फिर क्या था! सड़क पर कदम बढ़ते रहे और विचार अपनी राह चलते रहे। हमारी उस सहज बातचीत ने इन वर्षगाँठों के ऐसे-ऐसे अर्थ गढ़ दिए कि हम स्वयं हँसते-हँसते लोटपोट हो गए। लगा जैसे इन नामों का शब्दकोश किसी विद्वान ने नहीं, बल्कि दशकों तक वैवाहिक जीवन जी चुके किसी अनुभवी दंपति ने लिखा हो। उसी हँसी-ठिठोली और जीवन के मधुर व्यंग्य से जन्मे ये छंद आपके समक्ष प्रस्तुत हैं।
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मेरी बिटिया के आदेश का पालन। 
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