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3mefasavaykti

@Past the power

Jaunpur, Uttar Pradesh, India

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ताऊ, खांचा और सरदार को मेरा जय हो, जय हो, है हो! आज का दिन कुछ महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर आज के बाद के सात दिन मेरी अच्छी तबीयत से बीत गए, तो शायद मेरे भीतर एक नई ऊर्जा का संचार हो। मैं थक चुका हूँ, फिलहाल अपने रोज़मर्रा के कामों से भी और विचारों के इस निरंतर संचार से भी। किस्सा कुछ है नहीं, पर कहने को वेद-पुराणों से भी ज़्यादा है मेरे पास। भरा बैठा व्यक्ति कैसा होता है, यह आज समझ पा रहा हूँ। या यूँ कहूँ कि ख़ुद अपने भीतर विचारों का इतना बोझ लेकर बैठा हूँ कि अब उस एहसास को महसूस कर पा रहा हूँ। शायद माँ-पिता के साथ अगले कुछ दिनों का समय मुझे आने वाले कुछ महीनों को काटने, या यूँ कहें कि जीने की ऊर्जा दे जाए। एक अधेड़ में फँसा हूँ। समझ नहीं आता कि यह नौकरी छोड़ दूँ या कुछ नया करने का समय अब निकल चुका है। व्यक्ति पूरी ज़िंदगी भागता रहता है, मगर भाग नहीं पाता वहाँ से, जहाँ से वह वास …read more
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तीन तालियों को जय हो! आज दिन गुरुवार है और दफ़्तर में अब काफ़ी सन्नाटा रहने लगा है। जैसा कि मैं कंक्रीट के जंजाल वाले जंगल में रहता हूँ, तो यहाँ अकेले ही रहता हूँ। दिन काटने के लिए आज दफ़्तर चला आया। अब सोच ही रहा था कि दिन कैसे भी करके मगर अच्छे से कट जाए, तभी मैनेजर का संदेश आ गया कि आज जो काम बताया गया है, उसमें पूरा दिन नहीं लगेगा, इसलिए उसे जल्दी ख़त्म करो। अब चिढ़, क्रोध और हताशा से भरा बैठा हूँ। सोच रहा हूँ कि यार, आख़िर यह दिन कब ख़त्म होगा! ताऊ, सरदार और खांचा को जय हो जय हो जय हो
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तीन तालियों को जय हो! आज मैं अपने जीवन के कुछ पल साझा करना चाहता हूँ। दुनिया की भागदौड़ में फँसा व्यक्ति कितना लाचार है, या कहें कि अपनों से कितना दूर हो गया है, यह मैंने परसों देखा। तारीख थी 2 नवंबर 2026। मैं अपने एक मित्र के घर बैठा था। वे ऑफिस की एक मीटिंग में शामिल थे। मैं भी वहीं बैठकर सुन और देख रहा था कि क्या बातें हो रही हैं। मेरा और उनका पेशा एक ही है। हम पहले एक ही कंपनी में थे, अब वे दूसरी कंपनी में हैं और मैं तीसरी में। मीटिंग शुरू होने से पहले किसी व्यक्ति ने, जिनका नाम मुझे याद नहीं, यह सूचना दी कि उनके पिताजी का देहांत हो गया है। सबने शोक व्यक्त किया और उम्मीद जताई कि वे जल्द से जल्द अमेरिका से भारत अपने घर लौट सकें। लेकिन शाम को हमने देखा कि वही व्यक्ति मीटिंग में मौजूद हैं। बाकायदा बातचीत कर रहे हैं और अपने हिस्से के काम का ब्यौरा दे रहे हैं। मैं और मेरा मित् …read more
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दिवाली आने वाली है। हवा में ठंडक है, साथ-साथ प्रदूषण भी। घर लौटने का मौसम है और हम दफ़्तर में बैठकर बस समय काट रहे हैं। पिछली पोस्ट से पता ही होगा कि दिल ठहराव खोज रहा है और हमें पता नहीं क्या-क्या। दफ़्तर में बैठे तीन ताल सुन रहे हैं और आगे की कोई योजना नहीं बना रहे। मंगलवार की सुबह है और दिल चाहता है कि जल्दी से जल्दी शुक्रवार आए और हम घर चले जाएँ। मेरे जैसे करोड़ों लोगों की भी शायद यही चाहत होगी। पता नहीं दूसरों की स्थिति मेरी जैसी है या नहीं, पर अपनी स्थिति पर अब कुछ ज़्यादा ही तरस आने लगा है। लक्ष्मी की पूजा करने वाला यह देश धनतेरस मनाएगा, पर धन के चक्कर में किसी की तेरहवीं में शामिल नहीं हो पाऊँगा। उन्माद से भरा शरीर अब मंदी के दौर से गुज़र रहा है। न जाने यह ठहराव कहाँ ले जाएगा!
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ताऊ खानचा और सरदार को प्रणाम! मैं पूर्वांचल के एक छोटे से जिले से आता हूँ। मेरा बचपन खानों (कोयले वाली) में बीता है। आज लगभग एक साल हो गया है आपको सुनते हुए और तीन महीने आपको अच्छे से समझते हुए। पिछले कुछ दिनों में मेरे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं, जिन्होंने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। मेरी एक प्रेमिका थी। उसने आगे रिश्ता जारी रखने से मना कर दिया। उसका कहना था कि मैं जीवन को बहुत अलग तरीके से जीता हूँ। मैं अपने लक्ष्यों के पीछे इतना भागता हूँ । आज मैं कंक्रीट के जंजाल जैसे शहर में रहता हूँ, जहाँ हर कोई भाग रहा है, लेकिन पता नहीं किस दिशा में। मैं इस भागदौड़ के बीच थोड़ा ठहराव खोज रहा हूँ। आपको सुनकर मुझे अपने गाँव, अपना बचपन और अपना पुराना शहर याद आता है। लगता है जैसे कुछ पल के लिए उस जीवन में लौट गया हूँ, जहाँ सब कुछ इतना तेज नहीं था। मुझे किताबों से दोस्ती रही है। बचपन में सा …read more
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