13 जनवरी 2013 की रात, हम दिल्ली से ठीक 12 बजे निकले। जैसे ही हम मेरठ के पास पहुँचे, घना कोहरा शुरू हो गया, और आगे का सफर और भी मुश्किल हो गया। रास्ते में घने कोहरे की वजह से ही हम पूरी तरह भीग गए।
सुबह करीब 5 बजे हम रुड़की के पास एक ढाबे पर रुके। वहाँ हमने आग जलाई और उसके आसपास बैठकर अपने कपड़े, दस्ताने और खुद को सुखाया। उस ठंड और सफर की थकान के बीच वो पल थोड़ा सुकून देने वाला था।
करीब 11 बजे, आगे बढ़ते हुए हमने एक छोटा सा ब्रेक लिया। उसी दौरान, मैंने अपनी मोटरसाइकिल के सहारे ही कुछ मिनटों की नींद ले ली। वो सिर्फ 3 मिनट का छोटा सा पावर नैप था, लेकिन उन कुछ पलों में मैं गुलाबी पहाड़ों का सपना देख रहा था।
उसी वक्त, मेरे पीछे आ रहे राइडर ने मेरी सोते हुए यह तस्वीर खींच ली। यह तस्वीर उसी पल को कैद करती है|
जय हो!
सुनील थापा, दिल्ली