उजाले तो दिखते हैं, तुम्हे ये स्याह रात नहीं दिखती,
मुफ्त का राशन तो दिखता है, तुम्हें गरीबी नहीं दिखती,
रिक्शे को हाथ से खींचते बूढ़े आदमी की,
सिर पर सीमेंट की बोरी रखे मजदूर की,
तुम्हारे घर से कूड़ा उठाने वाले लड़के की,
१०—२० रुपए ज्यादा लूटने की हसरत तो दिखती है,
तुम्हें उसके पसीने में छुपी गरीबी नहीं दिखती,
साफ़ चमकती रोड,
सफाई से कटे हुए सड़क किनारे के पौधे,
चमकती हुई इमारतें,
चमचमाते हुए तुम्हारी गाड़ियों के शीशे,
सब कुछ दिखता है तुमको, तुम्हारी हवेली से,
पर भूख से बिलखते बच्चे, और खाना ढूंढती उनकी मां नहीं दिखती ,
दिखता भी होगा, तो तुम मुंह मोड़ लेते होगे,
रूह की आँखें ही बंद हैं,
शायद इसीलिए तुम्हे गरीबी नहीं दिखती ! - ब्रजेश