व्यंग सा लग रहा है किंतु चिंतनीय है कि एक देश आर्थिक विकास में पूरे विश्व में प्रथम कैसे हो सकता है जबकि उसका हैप्पीनेस इंडेक्स भी सबसे उच्च हों ?
हर दूसरा आदमी जो किसी ऐसे निकाय में कार्यरत है जिसका देश की आर्थिक विकास से संबंध है वो अपना सबकुछ त्याग के नौकरी कर रहा होता है और जानते ही हो नौकरी तो खून चूसती है तो यह तो संभव हो ही नहीं सकता ।
नौकरी में फंसा आदमी कैसी भी हो वो एक सिस्टम को चलाने वाले पहिए में लगे नट जैसे होता है , मतलब आकार छोटा किंतु किरदार जिम्मेदार वाला,
पहिए उसे फील कराते है कि भाई ! तुम्हारे भरोसे ही चल रहे है
ऐसे में बेचारा नट अपनी बिना परवाह किए घिसता रहता है कभी कभी तो पूरी गाड़ी का भार लेके चलता है , मेनटेन करने के बहाने सिस्टम उसकी कभी कभी पाने से भी बाहर से कसाई कर देता है इससे उसकी बाहरी परत भी अपना मूल खोने लगती है ऐसे करते करते जब एक दिन ऐसा आता की नट उस सिस्टम के दबाव को झेल नही पाता तो , मेकैनिक रूपी ह्यूमन रिसोर्स वाले उसको उठा के डब्बे में फेक देते है और फिर उनकी जगह ले लेते है कारखाने में तराशे गए नए नट , ये नए नट उन सरल स्वभाव और उदार पुराने लोहों की संताने होती है जिन्होंने अपने बारे में कभी नहीं सोचा।