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profileTT Lucknow | तीन ताल लखनऊ के लाल
जापान में दो भाई रहते थे। एक का नाम ‘जो’ था। दूसरे का नाम ‘वो’ था। एक रात ‘जो’ को बाथरूम में भूत दिखा। ‘जो’ डर गया और उसने ‘वो’ को आवाज़ लगाई। ‘वो’ दौड़ते हुए बाथरूम में आया और भूत को देखते ही उसका हार्ट फेल हो गया और ‘वो’ मर गया। बस उसी दिन से कहावत हो गई— ‘जो’ डर गया, ‘वो’ मर गया।
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सभी को मेरा सादर नमस्कार! आज यहाँ मेरा पहला दिन तो नहीं है, लेकिन यह मेरा पहला लेख ज़रूर है। आशा करता हूँ कि मेरे आने वाले लेख आप सभी को पसंद आएँगे। मैं अपने विचार और लेख इसी प्लेटफ़ॉर्म पर प्रस्तुत करना चाहता हूँ, क्योंकि शायद आज के सोशल मीडिया के दौर में, जहाँ लोग एक-दूसरे के विचारों में बहुत कम दिलचस्पी दिखाते हैं, वहाँ अपने मन की बात कहने और दूसरों के विचारों को समझने के लिए यह एक बेहतर माध्यम हो सकता है। मुझे यहाँ किसी प्रकार की लोकप्रियता या अपने लेखों के वायरल होने की कोई तमन्ना नहीं है। मेरी बस इतनी-सी इच्छा है कि यदि आपको मेरे विचार पसंद आएँ, तो आप अपने विचार भी मेरे साथ साझा करें। आपकी सहमति हो या असहमति, दोनों का मैं दिल से स्वागत करूँगा। अभी तक मैंने कुछ लिखा नहीं है, लेकिन मेरे पास साझा करने के लिए बहुत-सी बातें हैं, बहुत-से विचार हैं और कई अनुभव हैं, जिन्हें मैं आप सभी के सा …read more
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पहले अध्याय का अगला भाग मैं न तो इसे जवानी की कोई परिभाषा बनाना चाहता हूँ और न ही किसी के सामने अपनी ज़िंदगी की मिसाल पेश करना चाहता हूँ। ये बस मेरी कुछ यादें हैं, जिन्हें शब्दों में समेटने की एक छोटी-सी कोशिश कर रहा हूँ। कुछ किस्से ऐसे होते हैं, जिन्हें वक्त तो पीछे छोड़ देता है, लेकिन दिल कभी उनसे आगे नहीं बढ़ पाता। यह तो बस शुरुआत है। देहरादून के उन दिनों की ऐसी कई कहानियाँ अभी बाकी हैं, जिन्हें मैं अपने अगले लेखों में आपके साथ साझा करता रहूँगा।
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Teen taal ki 4 pillars (Atul ji included) ko Amsterdam ki flat earth se salaam. Maine varanasi wala episode miss kar diya tha, aaj catch up karke suna k Navsari aur Jhalawaad ka mention sunn kaafi included mehsoos hua. Mera navsari me janam hua aur meri maa Jhalawaad se belong karti hai. Maine iss chhote se dandi march town ko bada hote dekha aur aaj Jamsetji Tata ka ye shehar badh ke ek Maha-Nagarpalika ho gai. Inn do jagaho ko include karke kahin na kahin hume b teen taal ek chhota sa hissa banane ke liye bohot bohot shukriya. Agar aap ko kabhi naseeb nai hua ho to kisi din zarur aayega aur Kesar, Langda ityadi mangoes ko zarur leke jayyega apne saath
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नमस्कार सबको ये तीन ताल का ग्रुप कहा मिलता है हमको भी जाना है 😂 अगर किसी को पता हो तो ज़रूर बताएं
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"यूँ हुई जवानी की शुरुआत..." अभी  उम्र महज़ 23 साल है, लेकिन यह कहानी उन दिनों की है, जब मैंने बीसवें साल में कदम ही रखा था। उस उम्र में न तो मुझे ज़िंदगी की कोई खास समझ थी और न ही यह पता था कि आखिर करना क्या है। कुछ निजी कारणों से मुझे देहरादून जाना पड़ा। एक ऐसा शहर, जहाँ न कोई मुझे जानता था और न मैं किसी को। शायद यही अनजानापन था, जिसने मुझे पहली बार आज़ादी का असली एहसास कराया। वहाँ मैंने ज़िंदगी को करीब से देखा, समझा और अपने तरीके से जिया। वो दिन मेरे जीवन के सबसे बेफिक्र दिनों में से थे। उम्र का जोश था, चेहरे पर आत्मविश्वास था और लड़कियाँ भी भाव देने लगी थीं। उन्हीं में से एक ऐसी मिली, जो धीरे-धीरे मेरे दिल के करीब आती चली गई। वह आज भी मेरे साथ है और दिल से यही चाहता हूँ कि आने वाले हर दौर में भी मेरे साथ रहे। ज़िंदगी अपने पूरे उफान पर थी और शायद मैं भी। दोस्तियाँ गहरी होती जा रही थ …read more
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Jai ho... Mai teen taal ka Naya shrota kyy mujhe koi lucknow ke teen taal ke aur bhi nashedi logo se judne ke lia whatsapp group mil skta hai
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मेरा नाम alone warrior है वैसे तो मै कानपुरिया हूं, पर रोटी के तलाश करते हुए अब लखनवीं बाशिंदा हूं, उम्र 35 वर्ष, अविवाहित व कुछ वर्षो से सदैव के लिए अखंड ब्रम्हचारी. कुछ समय पूर्व, मैं अपनों से या शायद खुद से बहुत निराश था. तब पता नहीं कैसे पर किसी जागती रात आँखो में खान चा की निर्विकार बच्चों सी तस्वीर वा मुस्कराहट मोबाइल स्क्रीन पे आ दिखी, वो शायद अपनी बेटी ,अपने संघर्ष और अपने परवारिक चुनौतियों की बात कर रहे थे, फिर ताऊ का वो सूर्णिम सूत्र " भला करो , दुनिया याद नहीं रखेगी" , जो की अब मेरा मूल मंत्र बन चुका है, मैंने उनकी कुछ लाइन सुन कर, कई घंटो तक ये सोचा कोई व्यक्ति इतना वैरागी और नो- कम्प्लेनिंग कैसे हो सकता है! मै इस पत्र को लिख रहा हूँ तो दीपावली के दो दिन पहले की शाम है , अकेला अपने रूम में बैठा हुआ था, बाहर से दो दिन पहले से ही पठाखो की आवाज आ रही हैं, जैसा हम बचपन में करत …read more
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Mujhe bhi shaamil hona hai kripaya sudhijan nirdeshit karen
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सच ये है बेकार हमें ग़म होता है जो चाहा था दुनिया में कम होता है ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम हमसे पूछो कैसा आलम होता है ग़ैरों को कब फ़ुरसत है दुख देने की जब होता है कोई हमदम होता है ज़ख़्म तो हमने इन आँखों से देखे हैं लोगों से सुनते हैं मरहम होता है ज़हन की शाख़ों पर अशआर आ जाते हैं जब तेरी यादों का मौसम होता है
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