मेरा नाम alone warrior है वैसे तो मै कानपुरिया हूं, पर रोटी के तलाश करते हुए अब लखनवीं बाशिंदा हूं, उम्र 35 वर्ष, अविवाहित व कुछ वर्षो से सदैव के लिए अखंड ब्रम्हचारी. कुछ समय पूर्व, मैं अपनों से या शायद खुद से बहुत निराश था. तब पता नहीं कैसे पर किसी जागती रात आँखो में खान चा की निर्विकार बच्चों सी तस्वीर वा मुस्कराहट मोबाइल स्क्रीन पे आ दिखी, वो शायद अपनी बेटी ,अपने संघर्ष और अपने परवारिक चुनौतियों की बात कर रहे थे, फिर ताऊ का वो सूर्णिम सूत्र " भला करो , दुनिया याद नहीं रखेगी" , जो की अब मेरा मूल मंत्र बन चुका है,
मैंने उनकी कुछ लाइन सुन कर, कई घंटो तक ये सोचा कोई व्यक्ति इतना वैरागी और नो- कम्प्लेनिंग कैसे हो सकता है!
मै इस पत्र को लिख रहा हूँ तो दीपावली के दो दिन पहले की शाम है , अकेला अपने रूम में बैठा हुआ था, बाहर से दो दिन पहले से ही पठाखो की आवाज आ रही हैं, जैसा हम बचपन में करत …read more