लियो,बोसा, टुकुर और फ़लक बिटिया को जय हो जय हो जय हो
ख़ालूजान जो थे हमाए,मौसा जी मरहूम, ग़रीबी से उठकर अपनी शिक्षा और मेहनत के बल पर SAIL में senior executive बने थे, मगर थे बड़े साफ़गो यानि सरल भाषा में एकदम ठेठ, वाकपटुता और भाषा सौंदर्य उनका अपने ही रंग का था बिना माँ, बहन को स्मरण किए एक भी वाक्य उनका पूर्ण नहीं होता था।
तो जनाब उनको खुजलाने की खुजली थी वो भी भयंकर सार्वजनिक रूप से और ऐसे स्थान पर जिसे सर्व साधारण लोग where is the men's room पूछ कर मिटाने जाते हैं।
तो बात ऐसी है कि ख़ालूजान जब भी हमारे ग़रीबख़ाने तशरीफ लाते तो दादा हुज़ूर उन्हें पान पेश कर दिया करते,
वो तो हम लोगों को काफ़ी दिनों बाद पता चला कि दादा हुज़ूर को ख़ालूजान के हाथ चलाने से ज़्यादा कोफ़्त उनके ज़ुबान चलाने से होती थी।
"गिलौरी खाया करो गुलफ़ाम ज़ुबान क़ाबू में रहती है", शायद हमाए दादाजान ने ही ख़ालूजान के लिए कहा होगा