ये जो फोटो है, इनका नाम है रॉकेट। मुलाकात हुई और हमने भी निर्णय लिए “हम भी बिल्ली पालेंगे!” कारण सीधा था, कुत्ते हमारे दियासलाई जैसे फ्लैट में फिट नहीं बैठते। हमारे अनुभवी मित्र ने तुरंत ब्रेक लगाया बोले, “पहले किसी बेघर जानवर को रोज खाना खिलाओ, गायब हो जाए तो ढूंढो, बीमार हो तो इलाज करवाओ… ये सब 4 महीने कर लो, फिर 15 दिन के लिए ‘रॉकेट’ को रख लेना।” मतलब सीधे इंटरव्यू नहीं, पहले इंटर्नशिप! उधर सरदार ने भी जो बताया था सब मैच कर रहा था, खाना अलग, फ्लेवर अलग । हमने 2 दिन वहीं रहकर रॉकेट का रूटीन देखा—जनाब का टाइमटेबल हमसे ज्यादा टाइट। एटिट्यूड इनके उन्नत ब्रीड से आते हैं । ये जब आया था तो ३५ हजार का था २ महीने का । तीसरे दिन ही हमने हाथ जोड़ लिए“भाई, हमसे ना हो पाएगा।”
जो थोड़ी बहुत खुशी बची है, वही संभाल कर रख लेते हैं… और आते जाते दूर से सलाम ठोक लेंगे ।