पहले पैदा होना उपलब्धि लगता है । हमारी पीढ़ी शायद सबसे दिलचस्प दौर की गवाह रही है। लालू राज देखा, बिहार का विभाजन देखा,1992 का उथल-पुथल देखा, रथ यात्रा देखी, फिर अन्ना आंदोलन भी। रेडियो सीलोन की खड़खड़ाती आवाज़ से लेकर आज लैपटॉप पर प्रसार भारती की लाइव स्ट्रीम तक का सफर तय किया। DOS से Windows 95, फ्लॉपी डिस्क से AI Enabled M365 और Intel Core i7 तक की यात्रा देखी। KB में गिनी जाने वाली मेमोरी को TB में बदलते देखा। रात में टेलीफोन बूथ पर लाइन लगाकर बात करने से लेकर आज eSIM, वीडियो कॉल और ईयरपॉड्स तक का दौर जी लिया। हम वह पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी और बुलेट ट्रेन दोनों की कल्पना को समझा, अंतर्देशीय, ओपन पोस्टकार्ड चिट्ठी और चैट दोनों का इंतज़ार किया, और एनालॉग से डिजिटल होते संसार को अपनी आंखों के सामने बदलते देखा।
शायद यही वजह है कि बदलाव हमें डराता कम है, रोमांचित ज़्यादा करता है।