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ढोंगी दार्शनिक

@abhishek_dltg

Pune, Maharashtra, India

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 आज भोरे भोरे एक गाना कंठ में अटक गया अब पता नहीं दिन कैसे निकलेगा , शाम से पहले तो निगल नहीं पाएंगे बिना पीरबाबा के मदद के 🥃  कर न सके हम प्यार का सौदा कीमत ही कुछ ऐसी थी जीती बाज़ी हार गए *हां*😫 किस्मत ही कुछ ऐसी थी 😞
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"सरकार सुनने वाली नहीं है..." 😄 किसी ने बड़ी गहरी बात कही थी— "जब लोगों में सुनने का सब्र न रहा, तो मैंने बोलना कम कर दिया।" अब बात उस महान वैज्ञानिक प्रयोग की, जिसका नाम है इथेनॉल। 😄 हमने तो खून-पसीने की कमाई और EMI पर बाइक-कार खरीदी थी, लेकिन अब लगता है गाड़ी भी रोज़ "डाइट प्लान" पर है। पिछले कुछ दिनों से मैं भी देसी रिसर्च में लगा हूँ। आधा टैंक E20, आधा टैंक XP95 भरवा रहा हूँ। हिसाब लगाऊँ तो मेरी गाड़ी अब लगभग E12.5 पर चल रही है। अब अगली बार पेट्रोल पंप वाला पूछेगा— "सर, कितना पेट्रोल डालूँ?" मैं कहूँगा— "भाई, ऐसा कॉकटेल बना कि इंजन भी खुश रहे और सरकार भी!" 😂 वैसे अगर इसी रफ्तार से प्रयोग चलते रहे, तो आने वाले समय में गाड़ी खरीदते वक्त माइलेज नहीं, "आज कौन-सा E-फ्लेवर चल रहा है?" पूछना पड़ेगा! 🤭 नोट: विज्ञान और सरकार दोनों का सम्मान करते हुए मुस्कुराइए। 😉
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।। जय हो ।। नए स्टूडियो की बधाइयां लेकिन सीटिंग कुछ जम नहीं रहा है । एक तो ये फिर न्यूज पैनल सा लग रहा है बैठकी वाला फील नहीं आ रहा है । दूसरा सरदार की गर्दन पर जोर आ रहा है एक्सट्रीम लेफ्ट तो एक्सट्रीम राइट और ज्यादा समय एक्सट्रीम लेफ्ट साइड मुड़ के बैठे दिख रहे है .. दिल अजीज खान चा फिलर टाइप लग रहे जो न्यायसंगत नहीं है । पहले बैठकी वाला सेटअप था diagonal सरदार अपने नजर से ताऊ और खांचा में सामंजस्य बैठा लेते थे।  अब बेला में ला का मतलब कुछ भी हो हमें तो ला का मतलब घाटी या पासेस ही मालूम है । रोहतांगला , चांगला , खारदुंगला , दार्चला इत्यादि इत्यादि .....
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दोनों अनमोल ..... समोसा चाट के साथ एक अकेला इस शहर में....
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पहले पैदा होना उपलब्धि लगता है । हमारी पीढ़ी शायद सबसे दिलचस्प दौर की गवाह रही है। लालू राज देखा, बिहार का विभाजन देखा,1992 का उथल-पुथल देखा, रथ यात्रा देखी, फिर अन्ना आंदोलन भी।  रेडियो सीलोन की खड़खड़ाती आवाज़ से लेकर आज लैपटॉप पर प्रसार भारती की लाइव स्ट्रीम तक का सफर तय किया। DOS से Windows 95, फ्लॉपी डिस्क से AI Enabled M365 और Intel Core i7 तक की यात्रा देखी। KB में गिनी जाने वाली मेमोरी को TB में बदलते देखा। रात में टेलीफोन बूथ पर लाइन लगाकर बात करने से लेकर आज eSIM, वीडियो कॉल और ईयरपॉड्स तक का दौर जी लिया। हम वह पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी और बुलेट ट्रेन दोनों की कल्पना को समझा, अंतर्देशीय, ओपन पोस्टकार्ड चिट्ठी और चैट दोनों का इंतज़ार किया, और एनालॉग से डिजिटल होते संसार को अपनी आंखों के सामने बदलते देखा। शायद यही वजह है कि बदलाव हमें डराता कम है, रोमांचित ज़्यादा करता है।
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भोज - हमारे गांव में कुछ ऐसे वीर जवान थे जिनकी पहचान खेती-बाड़ी से कम और भोज-भात से ज्यादा थी। इलाके में उनका नाम था — "हड़िया डोलावन पंडित"। जहां बैठ जाएं, वहां पूरी वाले पहले से अतिरिक्त आटा गूंथ लें! कई बार तो सब्जी से पेट भर लें। एक बार किसी शरारती ने खबर उड़ा दी कि पास के गांव के पंडित जी के यहां भोज है। बिना सत्यापन के चण्डाल चौकड़ी निकल पड़ी। गांव पहुंचकर देखा—न आलू-परवल की खुशबू, न कड़ाही की खटर-पटर। फिर भी उम्मीद के सहारे सीधे पंडित जी के दरवाजे पहुंच गए। उधर मजाक करने वाले ने गांव में पहले ही खबर फैला दी थी कि "भोज विशेषज्ञ मंडली" आने वाली है। फिर क्या था! भोज तो नसीब हुआ नहीं, लेकिन स्वागत लाठियों से हुआ। पत्तल की जगह डंडे और सब्जी की जगह प्रसाद स्वरूप पिटाई मिली। उस दिन सबने सीखा—भोज का निमंत्रण लिखित में ही मान्य है, मौखिक सूचना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है! 😄
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"आज तो खुजली की इतनी विस्तृत चर्चा सुनकर कान से मवाद निकलने लगा... पर खुजली का असली आनंद तो हल्का कुरेदने में ही है, और जब ज्यादा कुरेदेंगे तो मवाद निकलना ही था! अब मवाद निकलेगा तो घाव भरेगा, और फिर नई खुजली के लिए जगह बनेगी। 😄 घाव भरने लगा है इसका एक पहचान ये भी है कि आस पास खुजाने लगता है ।। ।। जय हो ।।"
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