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ढोंगी दार्शनिक

@abhishek_dltg

Pune, Maharashtra, India

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दोनों अनमोल ..... समोसा चाट के साथ एक अकेला इस शहर में....
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पहले पैदा होना उपलब्धि लगता है । हमारी पीढ़ी शायद सबसे दिलचस्प दौर की गवाह रही है। लालू राज देखा, बिहार का विभाजन देखा,1992 का उथल-पुथल देखा, रथ यात्रा देखी, फिर अन्ना आंदोलन भी।  रेडियो सीलोन की खड़खड़ाती आवाज़ से लेकर आज लैपटॉप पर प्रसार भारती की लाइव स्ट्रीम तक का सफर तय किया। DOS से Windows 95, फ्लॉपी डिस्क से AI Enabled M365 और Intel Core i7 तक की यात्रा देखी। KB में गिनी जाने वाली मेमोरी को TB में बदलते देखा। रात में टेलीफोन बूथ पर लाइन लगाकर बात करने से लेकर आज eSIM, वीडियो कॉल और ईयरपॉड्स तक का दौर जी लिया। हम वह पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी और बुलेट ट्रेन दोनों की कल्पना को समझा, अंतर्देशीय, ओपन पोस्टकार्ड चिट्ठी और चैट दोनों का इंतज़ार किया, और एनालॉग से डिजिटल होते संसार को अपनी आंखों के सामने बदलते देखा। शायद यही वजह है कि बदलाव हमें डराता कम है, रोमांचित ज़्यादा करता है।
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भोज - हमारे गांव में कुछ ऐसे वीर जवान थे जिनकी पहचान खेती-बाड़ी से कम और भोज-भात से ज्यादा थी। इलाके में उनका नाम था — "हड़िया डोलावन पंडित"। जहां बैठ जाएं, वहां पूरी वाले पहले से अतिरिक्त आटा गूंथ लें! कई बार तो सब्जी से पेट भर लें। एक बार किसी शरारती ने खबर उड़ा दी कि पास के गांव के पंडित जी के यहां भोज है। बिना सत्यापन के चण्डाल चौकड़ी निकल पड़ी। गांव पहुंचकर देखा—न आलू-परवल की खुशबू, न कड़ाही की खटर-पटर। फिर भी उम्मीद के सहारे सीधे पंडित जी के दरवाजे पहुंच गए। उधर मजाक करने वाले ने गांव में पहले ही खबर फैला दी थी कि "भोज विशेषज्ञ मंडली" आने वाली है। फिर क्या था! भोज तो नसीब हुआ नहीं, लेकिन स्वागत लाठियों से हुआ। पत्तल की जगह डंडे और सब्जी की जगह प्रसाद स्वरूप पिटाई मिली। उस दिन सबने सीखा—भोज का निमंत्रण लिखित में ही मान्य है, मौखिक सूचना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है! 😄
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"आज तो खुजली की इतनी विस्तृत चर्चा सुनकर कान से मवाद निकलने लगा... पर खुजली का असली आनंद तो हल्का कुरेदने में ही है, और जब ज्यादा कुरेदेंगे तो मवाद निकलना ही था! अब मवाद निकलेगा तो घाव भरेगा, और फिर नई खुजली के लिए जगह बनेगी। 😄 घाव भरने लगा है इसका एक पहचान ये भी है कि आस पास खुजाने लगता है ।। ।। जय हो ।।"
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@Khan_cha के लिए जहरीली शायरी  तेरे मिलने की आस न होती, तो ज़िंदगी आज इतनी उदास न होती। मिल जाती कभी तस्वीर जो तेरी, आज हमको तेरी तलाश न होती।। कुछ ख़्वाब अधूरे ही अच्छे लगते हैं, पूरा हो जाएँ तो फिर वो बात न होती। तेरी यादों का सहारा न मिलता अगर, इस दिल में धड़कनों की आवाज़ न होती।। ।। जय हो ।।
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आज नया एपिसोड आ जाएगा, उससे पहले “बदला विभाग” का एक किस्सा रह जाएगा… 😄 ख़ान चा सही कहते थे — “यादों को खुरचते रहिए, याददाश्त तंदुरुस्त रहती है।” हमारे ज्यादातर मित्र “भूमिहार” प्रजाति से हैं, बिहार वाले समझ गए होंगे। 😄 मेरा स्वयं का अनुभव आज भी यही कहता है ये लोग “कैटेलिस्ट” होते हैं — हर रिएक्शन शुरू करवाते हैं, लेकिन खुद उसमें शामिल नहीं होते। नुकसान हमेशा पंडित और बाबू साहब जैसे मित्रों का होता है। सतर्क रहें, सावधान रहें… इनके बदला लेने की मेमोरी 60 साल तक एक्टिव रहती है। 😄 इसी चक्कर में एक भूतपूर्व शिक्षक चलती बस में रगड़े गए बाद में पब्लिक ने हमें रगड़ा .. वैसे उन्हें खुद याद नहीं था कसूर क्या था, लेकिन 5-6 साल पुरानी बेइज्जती का हिसाब बाकी था।  कुछ लोग डायरी नहीं लिखते… बस “वक़्त आने पर याद दिला देंगे” वाले फोल्डर में सेव करके रखते हैं। 😄
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