मैं एक आम इंसान हूं
यहीं कहीं भीड़ में दिख जाता हूं
और पलक झपकते ही उसमें खो जाता हूं
छोटी-छोटी बातों पर अक्सर जिंदगी से रूठ जाता हूं
छोटी-छोटी खुशियों में खुलकर मुस्कुराता हूं
मैं एक आम इंसान हूं
यहीं कहीं भीड़ में दिख जाता हूं
अपनी जिंदगी से ज्यादा नहीं मांगता
बस दो पल का सुकून चाहता हूं
इसीलिए यह सुकून के लिए दर-दर की ठोकरें खाता हूं
मैं एक आम इंसान हूं
यहीं कहीं भीड़ में दिख जाता हूं
मैं भीड़ के हर एक चेहरे में हूं
जो कुछ पाने की आशा रखता है
हर रोज सपने पूरे करने के लिए मेहनत करता है
चाहे कितनी भी ठोकर खाए उठकर आगे बढ़ता है
अपनी जिंदगी के लिए थोड़ी आशा और थोड़ी निराशा का भाव रखता हूं
मैं एक आम इंसान हूं
यहीं कहीं भीड़ में दिख जाता हूं