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काग

@काका कागभुशुण्डि

Kolhapur, Maharashtra, India

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गुरुजी के बाग में आमों पर गदराई जवानी छाई हुई है। ज़माने में भी बस आम का ही चर्चा है सब अपने पसंदीदा आम को सर्वश्रेष्ठ बताने में जुटे हुए हैं, और आम है कि यह सोच सोच हल्कान हुआ जा रहा है कि आखिर कोई आम इतना खास कैसे हो सकता है? आखिर हर गर्मियों में आता ही है और बारिश शुरू होते होते कीड़े लग कुत्ते की मौत मर जाता है, हर आम को खास होने की यही क़ीमत चुकानी होती है! 
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हम सामान्यतः एक वाक्य का प्रयोग करते आये हैं भिन्न भिन्न रूपों एवम परिस्थितियों में,"मैं सो रहा था!" कदाचित कोई ही होगा जिसने इस वाक्य का प्रयोग कभी न कभी किसी न किसी रूप, किसी भाषा, किसी शब्द विन्यास में न किया हो। प्रश्न यह उठता है कि आखिर जब "मैं" सोता है तो वास्तव में सोता कौन है?  क्या वह शरीर सोता है जिसे वह "मैं" मैं कहकर संबोधित करता है? पर वह शरीर नींद में भी कभी करवटें बदलता है, कभी सिकुड़ता है कभी पसरता है, तो फिर भला यह कैसे कहा जा सकता है कि "शरीर" सो रहा है? क्या वह आंख सोती है जोकि सोते समय कुछ नहीं देखती? तो कितने ही लोग खुली आँखों के साथ भी तो सोते रहते हैं तो कैसे कहा जाय कि आंखें सोती हैं? क्या मन जिसका "मैं" अभिमान पालता है कि "मेरा मन", वह मन सोता है? पर वह मन तो कहा ही चंचल गया है जो स्थिर न हो सके वह भला सो कैसे सकता है? 
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काग
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कोशिश करना,असफल होना,नई चीज़ें सीखना,एक्सपेरिमेंट  करना ये सब हमेशा स्वागत योग्य हैं।लेकिन उससे पहले तुमने जिस तरह लोगों को उनकी एक्टिंग स्किल्स,स्क्रीनप्ले और परफॉर्मेंस के आधार पर जज कर रखा है,जिस तरह का एटीट्यूड और अहंकार तुम्हारे अंदर पनप चुका है वो किसी विद्यार्थी का नहीं लगता! वो एक ऐसे मूर्ख लड़के का व्यवहार लगता है जो खुद को पहले ही क्लास का टॉपर मान चुका हो।भाई,समाज तुम्हें भी उसी तराज़ू पर तौलेगा।और तुम्हारे सामने भी अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं।अगर तुमने रिहर्सल्स पर मेहनत की होती,वॉइस मॉड्यूलेशन सीखा होता,फेशियल एक्सप्रेशन्स पर काम किया होता,सही पॉज़ लेना सीखा होता तो शायद आज कोई तुम्हारी आलोचना नहीं कर रहा होता।जैसे पत्रकार बनने से पहले पत्रकारिता आनी चाहिए,जैसे नेता बनने से पहले नेतागिरी आनी चाहिए,जैसे बकैत बनने से पहले बकैती आनी चाहिए। हम भी पेले गए थे तुम भी पेले जाओगे! Jai Ho!
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उजाले तो दिखते हैं, तुम्हे ये स्याह रात नहीं दिखती, मुफ्त का राशन तो दिखता है, तुम्हें गरीबी नहीं दिखती,  रिक्शे को हाथ से खींचते बूढ़े आदमी की, सिर पर सीमेंट की बोरी रखे मजदूर की, तुम्हारे घर से कूड़ा उठाने वाले लड़के की, १०—२० रुपए ज्यादा लूटने की हसरत तो दिखती है, तुम्हें उसके पसीने में छुपी गरीबी नहीं दिखती, साफ़ चमकती रोड, सफाई से कटे हुए सड़क किनारे के पौधे, चमकती हुई इमारतें, चमचमाते हुए तुम्हारी गाड़ियों के शीशे, सब कुछ दिखता है तुमको, तुम्हारी हवेली से, पर भूख से बिलखते बच्चे, और खाना ढूंढती उनकी मां नहीं दिखती , दिखता भी होगा, तो तुम मुंह मोड़ लेते होगे, रूह की आँखें ही बंद हैं, शायद इसीलिए तुम्हे गरीबी नहीं दिखती ! - ब्रजेश
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आज नाराज है ... आज नाराज है फिर नींद मेरी आँखों से.... दूर है ख्वाबों की फिर ईद मेरी आँखों से....(१) कल को सोचा था कि कल तो आएगी, उस कल की आस लिए नींद, मेरी आँखों से...(२) आज नाराज है ... होश संभला ही था कि रोज की कशाकश ने,  सारा पानी लिया खरीद, मेरी आँखों से ...(३) आज नाराज है.... रूह के चाक- गिरेबां से झांकती है शिकस्त, अब नहीं जीत की उम्मीद, मेरी आँखों से ...(४) आज नाराज है.... उम्र भर पाल भरम हम हुआ किये मोहसिन हो रही आज है तरदीद, मेरी आँखों से.....(५) आज नाराज है... हम भी हो जाते खुद्दारों में शुमार, टपकें मोती दो जो मजीद, मेरी आँखों से.....(६) आज नाराज है...
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