आज के एपिसोड में आपने पत्रकारिता, मीडिया शिक्षा और उससे जुड़े भविष्य पर बड़ी रोचक चर्चा करी। सुनकर मुझे अपनी एक पुरानी चिट्ठी याद आ गई। कुछ समय पहले मैंने भी आप तीनों को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें मैंने अनुरोध किया था कि एक बार पारंपरिक शिक्षा से बाहर निकलकर भी करियर और शिक्षा के अपनी रुचि और क्षमता अनुसार विकल्पों पर चर्चा हो।
क्योंकि हमारे जैसे छोटे शहरों के बहुत से लाडले-लाडलियों को आज भी लगता है कि अगर इंजीनियर, डॉक्टर या सरकारी बाबू नहीं बने तो जीवन में विकल्प समाप्त हो जाते हैं।
जबकि आज दुनिया तमाम विषयों पर कितने नए रास्तों से भरी पड़ी है।
इसलिए विनम्र आग्रह है कि एक एपिसोड ऐसे भी क्षेत्रों पर हो जहाँ लाखों छात्र सिर्फ जानकारी के अभाव में पहुँच ही नहीं पाते।
क्योंकि कई बार समस्या प्रतिभा की नहीं होती ताऊ
समस्या ये होती है कि बच्चे को रास्ते का बोर्ड ही दिखाई नहीं देता
“तीन ताल” का लेटेस्ट एपिसोड सुनके फिर साबित हो गयो कि दुनिया में दो ही चीजें आदमी का मूड ठीक कर सकती हैं — इंदौर का पोहा और आप तीनों की बतरस।
ताऊ जी के तड़के, खान चा जी की नरम कटाई और सरदार की टाइमिंग ने फिर मजा बांध दिया।
ऐसो लगै जसो देश-दुनिया की सारी टेंशन चाय की प्याली में डुबो के हँसी में परोस दी हो।
तीन ताल सुनके आदमी सिर्फ हँसतो नी… थोड़ा समझदार भी हो जातो है। 👏😄