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Aditya Kumar Tiwari

@Shinchan

Gorakhpur, Uttar Pradesh, India

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Part-10-:और वह लूडो वाली बच्ची, वह माँ-बेटी… शायद वे इतने पीछे छूट गई हैं कि अब उनका हाथ पकड़ना भी मुश्किल हो गया है..... शायद अब कुछ बदल सके तो वह उनकी अगली पीढ़ी के लिए होगा........ बाकी बातें अपनी जगह हैं...... मुझे, या किसी और को, सरकारों को दोष देने का नैतिक अधिकार भी तब तक नहीं है, जब तक हमने स्वयं वोट देते समय इन मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी.... जो बोया है, वही काट रहे हैं.... रात के 1:37am बजे जो कुछ याद आया, लिख दिया, बहुत-सी घटनाएँ अभी भी छूट गई हैं।।।। अब फैज याद आ रहे, और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा... Read all parts on my page...
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Part-9-:यह सब देखकर लगता है कि हर व्यक्ति अपने-अपने समय के भारत में जी रहा है..... जो बच्चा रोल्स-रॉयस का सपना देख रहा है, वह शायद 2020 के भारत में जी रहा है.... जो स्कॉर्पियो को ही अंतिम सपना मान बैठा है, वह शायद 2010 के भारत में..... जो महिलाएँ आज भी रात के अँधेरे में मंदिर जाने को विशेष समझती हैं, वे शायद 1970 या उससे भी पुराने भारत में जी रही हैं....जो खुले में शौच के लिए जाती हैं, वे समय में उससे भी पीछे छूट चुकी हैं, Contd.. Read all parts on my page
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Part-8-:उसी गाँव में एक बेहद संपन्न ब्राह्मण परिवार की छोटी बच्ची अपने खिलौने, अपनी हँसी और अपनी मासूमियत उसी बच्ची के साथ बाँट रही थी.... वह दृश्य किसी भी विचारधारा से बड़ा था.... यहाँ पर एक घटना का ज़िक्र न करूँ तो अन्याय होगा, वो यह की जब मेरी उस छोटी बच्ची से 5 मिनट बात हुई तो उस अनपढ़ बच्ची ने मुझे कहा "रउवा आ हमरा में का अंतर ब बाबा रउवा उहे रोटी खानी हमहू उहे हमू कुर्ति पहिने बानी रउर बहिनियों" इसके जवाब में बोलने को तो बहुत कुछ था पर उसका इतना सोच पाना ही मेरे लिए बहुत था, वरना इस स्थिति में लोग गिड़गिड़ाते है दूसरों के सामने......Contd.
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Part-7-:इन्हीं सबके बीच एक बेहद मार्मिक दृश्य भी देखने को मिला..... एक माँ और उसकी लगभग 17–18 वर्ष की बेटी, जो एक निम्न जाति से आती हैं, बेटी शायद पोलियो से ग्रसित है.... माँ इतनी गरीब है कि दूसरों के घरों में काम करती है, शादियों में लोगों के घर काम करती है,दिन भर की मेहनत के बदले मात्र 150–200 रुपये और कभी-कभी मेहनताना एक साड़ी के रूप में मिलता है। Contd.
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Part-6-:गाँव की राजनीति तो अपने आप में एक अलग संसार है। कभी-कभी लगता है कि अमित शाह ने अपनी अचूक राजनीतिक रणनीति शायद गाँव-गाँव घूमकर ही सीखी होगी.... यहाँ की राजनीति किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं....जानबूझकर झगड़ा कराना, खेत की मेड़ खिसका देना ये सब कई बार पीओके और एलएसी से भी अधिक जटिल लगते हैं..... एक चाचा, जो गुटबाज़ी का गणित सबसे अच्छी तरह समझते हैं, कब आपके साथ खेल कर जाएँगे, आपको पता भी नहीं चलेगा......  यहाँ हर व्यक्ति अपने खेल का उस्ताद नज़र आता है..... Contd. 
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Part-5-:घर की छत पर बैठकर जब पूरे गाँव को देखता हूँ, तो विकास के नाम पर बस बिजली के खंभे दिखाई देते हैं, जिनसे लगभग 18 घंटे बिजली तो आती है, लेकिन वोल्टेज का कोई भरोसा नहीं होता , हा विकास के नाम सड़के जरूर बनी है लेकिन सड़को के पास लगे बिजली के खम्भों पर street light ka अभाव है, कुछ जगह तो मेन रोड जो राज्यों को जोड़ते है , ट्रक आते जाते है वहाँ भी street light नहीं है.... एक और चीज़ जो नज़र आती है वो है लगभग हर संपन्न या थोड़ा-बहुत सक्षम घर की छत पर सोलर पैनल.....लेकिन मैं इसे विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि मजबूरी का प्रतीक मानता हूँ.... अगर बिजली की व्यवस्था अच्छी होती, तो शायद इतनी बड़ी संख्या में सोलर पैनल लगाने की ज़रूरत ही न पड़ती.... दिलचस्प बात यह है कि शहरों में आज भी सोलर पैनल उतनी संख्या में नहीं दिखते, जितने गाँवों में..... Contd.
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Part-4-:आज लूडो किंग के दौर में शहरों से असली बोर्ड वाला लूडो लगभग गायब हो चुका है। वहीं गाँव में एक छोटी सी बच्ची, फटी हुई सलवार और जगह-जगह से उधड़ी कमीज़ पहने, हाथ में पासा लिए अपने एक कमरे के घर के बाहर बैठी लूडो खेल रही थी... उस पासे की "टक-टक-टक" की आवाज़ आज अभी महसूस कर पा रहा हु...... उसके चेहरे की मुस्कान उसकी दयनीय परिस्थितियों पर भारी पड़ रही थी.... लेकिन मैं, अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा एक तीसरा व्यक्ति, केवल करुणा भरी आँखों से उसे देख सकता था, कुछ कर नहीं सकता था..... और मन तब और भारी हो जाता है, जब आज भी महिलाओं को खुले में शौच के लिए जाते हुए देखता हूँ...... क्या इसे विकसित भारत और आज़ादी के 80 वर्षों की उपलब्धि कहा जाएगा? Contd.
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Part-3 आज भी ऐसी महिलाएँ हैं जो पति की हर आज्ञा का आँख मूँदकर पालन करना ही एक अच्छी स्त्री का लक्षण मानती हैं... यह कैसी कसौटी है? आज भी वे रात के दो बजे केवल मंदिर जाने के लिए उठती हैं, और कारण पूछने पर बस इतना कहती हैं कि "सुबह कोई देख लेगा।" लेकिन अगर कोई देख भी ले, तो क्या हो जाएगा? उनका बाहर जाने का यह एकमात्र प्रयोजन है, ऐसा नहीं है की घर में शौचालय न होना इसका कारण हो क्योंकि उनके घर तो है..... विडंबना यह है कि यही महिलाएँ जब शहर में रहती हैं, तो ये सारे नियम-कानून जैसे कभी थे ही नहीं ,सब गायब हो जाते हैं..... जो लोग कहते है गांव अच्छा है, उनसे यह सवाल है,यह सब देखने के बाद मैं कैसे मान लूँ कि गाँव बेहतर है? क्या केवल कम प्रदूषण और अच्छी सब्ज़ियाँ ही किसी जगह को अच्छा बना देती हैं? Contd.
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Part-2-:एक ही घर, एक ही कमरे में बैठे दो भाइयों में से एक रोल्स-रॉयस का सपना देख रहा है, जबकि दूसरा स्कॉर्पियो N को अपनी ड्रीम कार मानकर उसकी तस्वीर स्टोरी पर लगा रहा है....यही तो मानकों का अंतर है। कितनी विडंबना है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे देश के बहुत से लोग बड़े सपने देखने का साहस नहीं कर पाते या साहस करते है तो भी बड़े सपने का पैमाना नहीं समझ पाते... किसी के लिए 0 से 10 के पैमाने पर 3 ही 10 है, किसी के लिए 7 ही 10 है, और मुट्ठीभर लोग ही हैं जिनके लिए वास्तव में 10, 10 है......
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Part 1-:पिछले कुछ दिनों में गाँव में काफ़ी लंबा समय बिताने का अवसर मिला...... आख़िरी बार शायद 7–8 साल पहले इतने लंबे समय तक गाँव में रहा था... इस दौरान बहुत-सी बातें देखने और समझने को मिलीं, हो सकता है मेरा अनुभव सीमित हो, मेरा sample size बहुत छोटा हो, लेकिन जो कुछ मैंने देखा, उससे कई निष्कर्ष निकाले..... हम सभी यह बात जानते और मानते हैं कि भारत में एक भारत नहीं, बल्कि कई भारत साथ-साथ रहते हैं.... कोई 1950 के भारत में जी रहा है तो कोई 2026 के भारत में..... दसवीं कक्षा में मैंने इसका एक लंबा-चौड़ा वर्गीकरण भी किया था जिसमे भारत को  कुछ 5 या 7 पार्ट्स में वर्गीकृत किया था अब तो खैर  वो कुछ याद नहीं ,लेकिन वह बात फिर कभी... इन दिनों एक और रोचक बात समझ में आई—शायद भारत को केवल 7–8 श्रेणियों में बाँटना पर्याप्त नहीं, मुझे तो ऐसा लगा कि इस देश में 140 करोड़ से भी अधिक भारत बसते हैं..  Contd.
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