आज अनायस ही 'रामधारी सिंह दिनकर जी' की रचना 'रश्मिरथी' की पंक्ति याद आ गई:
"दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।"
मज़े की बात यह है कि अपने जीवन के 30 आधे-अधूरे मॉनसून देखने के बाद भी ये काव्य पढ़ा नहीं है। तो जो है, यही है। अब order करने का बहाना ढूंढ ही रहा था कि माँ ने नए purse की इच्छा जाहिर की। फिर क्या था? 21 अगस्त को एक amazon पार्सल को डिलवरी होगी जिसके बारे में मुझे पूरा पता है, माँ को आधा और पिता जी.........वो तो सारी discussion से पहले हो रात्रि भोज करके सो चुके थे।